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मैं कोई योगी सिद्ध-साधक, सन्त-महात्मा आदि नहीं हूँ। हाँ यह सम्भव है कि पिछले जन्मों के आध्यात्मिक संस्कारों के वशीभूत मेरी आत्मा में जीवन के आरम्भ काल में अवश्य उन आध्यात्मिक जिज्ञासाओं और कौतूहलों की सृष्टि हुई जिनके फलस्वरूप मुझे अनगिनत दुर्गम यात्रायें करनी पड़ी। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी यात्राओं के दौरान मुझे अनेकों उच्चकोटि के दिव्यावस्था प्राप्त सिद्ध-योगियों और दिव्यात्माओं का साक्षात्कार और सान्निध्य प्राप्त हुआ। किसी ने मुझे आशीर्वाद दिया, किसी ने मेरी दीर्घायु की कामना की, किसी ने जन्म-मृत्यु के सच्चे रूप का दर्शन कराया, किसी ने निरपेक्ष भाव से जीने की कला बतलाई और किसी ने मुझे योगनिद्रा के उस अन्तहीन महास्वप्न का साक्षात्कार कराया। जिसमें प्रविष्ट होकर मेरी आत्मा अपने आप में एक परमशून्य का बराबर अनुभव करती रहती है।

उसी के परिणाम स्वरूप मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा ये चारों दार्शनिक तत्त्व धीरे-धीरे मेरे जीवन के अंग बन गये। जिसका परिणाम ये हुआ कि मेरे अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी दोनों अस्तित्व में परमशान्ति का साम्राज्य स्थापित हो गया और भर गयी परम शान्ति से मेरी आत्मा और उसी के साथ एक ऐसी अतीन्द्रिय संवेदना भी मुझमें उत्पन्न हो गयी जिससे मोह-माया, आकर्षण और राग-अनुराग से मुक्त होकर सत्य का साक्षात्कार करने लगी मेरी अन्तरात्मा।

हमारे भीतर असीम नैसर्गिक और परानैसर्गिक शक्तियों का विपुल भण्डार है। जब तक उसे न पहचाना जायेगा हमारी इन्द्रियाँ सीमाओं में बँधी रहेंगी और उन आश्चर्यजनक पारलौकिक घटनाओं और रहस्यों को समझने व प्रयोग करने से रोकती रहेंगी। हमारे ग्रन्थों में बहुत कुछ विस्तार से लिखा भी हुआ है जो कभी-कभी किसी दृष्टान्त के रूप में सामने भी आ जाता है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से उसकी पुष्टि नहीं हो पाती क्यों कि विज्ञान की अपनी एक सीमा है। लेकिन आज अनेक देशों में परामनोविज्ञान का आश्रय लेकर उन गूढ रहस्यमय विषयों पर शोध और अन्वेषण कार्य व्यापक रूप से किया जा रहा है। इन्हीं सबको देखते हुए, पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर और अन्धविश्वास की पर्तें हटाकर मैंने स्वतन्त्र रूप से तन्त्र-मन्त्र-योग तथा परामानसिक जगत से सम्बन्धित विषयों पर शोध और अन्वेषण कार्य शुरु किया।

यहीं से शुरुआत हुई सत्य की खोज में मेरी आध्यात्मिक दुर्गम यात्राओं की और उन अविश्वसनीय, अलौकिक अनुभवों की जिन पर सहसा विश्वास नहीं होता जो स्वाभाविक भी है। इस मार्ग के पथिकों के लाभार्थ अपने अनुभवों को लिपिबद्ध करना शुरु कर दिया मैंने।

जितनी घटनाएँ मैंने अपनी पुस्तकों में लिखी हैं वे ऐसे गूढ रहस्यों से भरी हुई हैं जिनको पढकर जिज्ञासा और कौतूहल की सृष्टि होना स्वाभाविक ही है। परन्तु "अभौतिक" और "पारलौकिक" ये दो शब्द कोई अर्थ नहीं रखते मेरे लिये क्यों कि ये दोनों परम्परागत शब्द मन की सीमा में आते हैं। यदि हम उन दोनों शब्दों को कल्पना भी मान लें तो फिर भी वे मन की सीमा में बंध जाते हैं। इसलिये कि कल्पना का जन्मदाता मन ही है। रही "रहस्य" की बात वह भी मन की ही उपज है। जिस वस्तु का हमारी बुद्धि विश्लेषण नहीं कर पाती, उसके कारण कार्य को ठीक-ठीक समझ नहीं पाती; मन उस वस्तु को रहस्य कहता है लेकिन जब वही रहस्य किसी कारण और किसी अवस्था में अनावृत हो जाता है तो फिर कोई "रहस्य" रहस्य नहीं रह जाता।

प्रायः लोग उत्सुकतावश पूछते हैं कि इतनी सारी यात्राएँ, इतना सारा लेखन एक जीवन में कैसे सम्भव है? इस सम्बन्ध में मेरा उत्तर है "समय का मूल्य" जिसे मैंने समझा और अपनाया है। श्री कृष्ण ने कहा है - "काल" यानि समय में मैं "क्षण" हूँ। आपको जीने के लिये केवल एक क्षण मिलता है और जब आप उस एक क्षण को जी लेते हैं तब आपको जीने के लिये प्राप्त होता है दूसरा क्षण। अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का महत्त्व समझ कर उसे पूर्ण रूप से जीया है मैंने। आयु का लेखा-जोखा मेरे लिये कोइ महत्त्व नहीं रखता। यहाँ तक कि मृत्यु भी मेरे लिये केवल एक घटना है जो केवल मेरे शरीर को बदल देगी, मुझे या मेरे अस्तित्व को नहीं। लेखन शैली और प्रस्तुतिकरण के सम्बंध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि मैं शब्द नहीं लिखता हूँ। अपने अनुभव लिखता हूँ जो मेरे जीवन के ध्रुव सत्य हैं।

सत्य की प्राप्ति के लिये सबसे पहले हमें अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को सत्य पर प्रतिष्ठित करना होगा। हम जैसे भी हैं और जो भी हैं व्यक्तित्व की स्वीकृति भी वैसी ही होनी चाहिये सीधी, सरल और पूर्ण स्वच्छ। लेकिन वह स्वीकृति हमारे मन के भीतर नहीं होती है। इसी कारण हम एक दोहरे व्यक्तित्व के साथ जीते रहते हैं। यही मूल कारण है कि जैसे-जैसे सभ्यता और संस्कृति विकसित होती गयी वैसे-वैसे मनुष्य "असत्य" होता चला गया। जीवन के "सत्य" को समझने की शुरुआत स्वयं को एक अबोध बालक की तरह सरल और सहज़ बनाकर ही सम्भव है।

मैं जानता हूँ हज़ारों लाखों मील लम्बा है कला और साहित्य का मार्ग। जिसकी पहली ईंट उषासूक्त का गान करने वाले वैदिक ऋषियों ने रखी। जिसके संवर्धन में न जाने कितने कवियों, नाटककारों, कथाकारों, कलाकारों और न जाने कितने साहित्यकारों ने अपने जीवन को समर्पित कर दिया। प्रतिदिन आगे बढते हुए इस राजमार्ग के एक किनारे मेरी भी एक छोटी सी ईंट का टुकड़ा लग गया है। यही मेरे जीवन की, मेरे साहित्य की और मेरे लेखन की चरम सार्थकता है। आत्मा वृद्ध नहीं हुई है, मन भी थका नहीं है, हाँ शरीर अवश्य वृद्ध हो गया है और थक भी गया है। यही मेरी विवशता है। फिर भी कलम दौड़ती है कागज़ पर कम से कम चार-पाँच घण्टे। मैं जितना जो कुछ लिखना चाहता हूँ, वह क्या इतनी समयावधि में पूरा हो पायेगा? नहीं, संभव नहीं। मेरे मस्तिष्क की लाखों कोशिकाओं में निःसन्देह पिछले कई जन्म-जन्मान्तरों का बौद्धिक और आध्यात्मिक ज्ञान भरा है जिसका कुछ ही अंश प्रकट हुआ है अभी तक। बस यही दुख है मुझे जिसका कोई समाधान नहीं। कभी-कभी अपनी इष्ट देवी से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ और याचना करता हूँ कि हे माँ! मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिये। यदि चाहिये तो बस यही कि अगले जन्म में ऐसा अवसर देना, ऐसा वातावरण देना, और ऐसी परिस्थिति देना जिससे और बहुत कुछ लिख सकूँ। इतना लिखूँ कि अन्तिम क्षण में मेरी उंगलियों में फँसी लेखनी कराहने लगी हो थक कर।

रही मृत्यु, वह तो निश्चित है। एक न एक दिन मुझे भी मरना है। जिस काया की वर्षों सेवा की उसे तो छोड़ना ही पड़ेगा कभी न कभी। एकाग्रचित्त से और शान्त भाव से प्रस्तुत हूँ उसके आलिंगन में बँधने के लिये। बगल ही में है हरिश्चन्द्र घाट का एतिहासिक और पौराणिक महाश्मशान। जिसके बगल की टूटी-फूटी और धूल भरी सीढियों पर बैठकर जीवन का अधिकांश समय व्यतीत किया है मैंने चिन्तन-मनन की दृष्टि से। न जाने कितनी चिताओं को धूँ-धूँ कर जलते हुए भी देखा है मैंने। कभी-कभी सोचता था कि मेरी भी चिता जलेगी इस महाश्मशान में इसी प्रकार, लेकिन मैं देख न सकूँगा। कथा की पूर्णाहुति देखेंगे लोग जिनमें एक व्यक्ति ऐसा भी होगा जो सबसे दूर और सबसे अलग-थलग पाषाणवत् खड़ा अपनी पथराई हुई आँखों से देखता रहेगा मेरी चिता में जलते हुए उन क्षणों को जिनको मेरे साथ जीया था उसने कभी और कभी महसूस किया था अपनी आत्मा के करीब मेरे अस्तित्व को। सपना सा लगेगा उसे सब। कुछ लोग आधी जली चिता को छोड़ कर खिसक जायेंगे श्मशान से। शेष, सीढियों पर बैठे गालों पर हाथ धरे छलछलाई आँखों से टुकर-टुकर चिता को मुट्ठी भर राख में बदलने की प्रतीक्षा करेंगे अनमने भाव से। लेकिन चिता के राख में बदल जाने बाद भी वह व्यक्ति नहीं जायेगा और अपने दोनों हाथों से अपना सिर थामकर कभी आकाश की ओर शून्य में देखेगा तो कभी भरी अपनी उदास आँखों से देखेगा चिता की गर्म राख से निकलती हुई धूँए की टेढी-मेढी लकीर को।

अखबार के किसी कोने में शोक समाचार छपेगा "अरुण कुमार शर्मा नहीं रहे"। कुछ समय तक यत्र-तत्र चर्चा होती रहेगी, चौराहे पर और पान की दुकानों पर। दो-चार संस्मरण भी सम्भवतः निकलें। कालान्तर में कोई शोधकर्ता मेरी रचनाओं और पुस्तकों पर शोध करे और लिखे कि 'शर्मा जी' अपने आप में एक रहस्यमय व्यक्ति थे। दुख की बात तो यह है कि उनके साथ ही अध्यात्म ज्ञान का बहुत सारा रहस्य भी काल के अंधकार में समा गया हमेशा के लिये। धीरे-धीरे समय व्यतीत होता चला जायेगा। काल की गति को भला कौन रोक सकता है। एक ऐसा भी समय आयेगा जब अरुण कुमार शर्मा को लोग भूल जायेंगे। उनकी तमाम कृतियों में ही सिमट कर रह जायेगी उनकी सारी स्मृतियाँ और अन्ततः वे स्मृतियाँ भी काल के तिमिराच्छ्न्न अंधकार में समा जायेंगी हमेशा-हमेशा के लिये।

यदि मेरी पुस्तकों को पढकर आपकी आत्मा "सत्य" के लिये व्याकुल हो उठे और तड़प उठे जीवन के उन रहस्यों को समझने के लिये तो मैं समझूँगा कि मेरा अस्तित्व ऐसे सत्य को उपलब्ध हो गया है जो शब्दों और भावों के द्वारा सुषुप्त जनमानस में आध्यात्मिक चेतना जागृत कर रहा है और यही मेरे जीवन की उपलब्धि होगी।

शुभाकाँक्षी
अरुण कुमार शर्मा
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